क्यों अठाईस, क्यों तीस है, क्यों ईक्कतीस की बात वैज्ञानिकता है नहीं केवल तम की रात केवल तम की रात न कोई कारण इसका दे कोई इसका कारण कोई पावे जग से टीका तम से चलो प्रकाश में, छोड़ो सब जंजाल भारत का पंचांग है, अजर,अमर, महाकाल

वेदों की उत्पत्ति व्यक्ति ,समाज और इस धरती पर उत्पन्न मानव जाति के लिए ही नहीं वरन चराचर जगत के संपूर्ण कल्याण हेतु सृष्टि के उदभब से लेकर आज तक की सबसे आश्चर्यजनक अद्भुत, विलक्षण, अकल्पनीय, सहज विश्वास ना होने वाली “ना भूतो ना भविष्यति” की श्रेणी में रखी जाने वाली वह आध्यात्मिक घटना है जिसको शब्दों में अभिव्यक्त करना संभव नहीं है I कदाचित जिस निमित्त स्वरूप यह सब हुआ उसे मानव अपनी आत्म प्रवंचना आत्म प्रवंचना के चलते इतना दूर हो गया की वेदों को भी हमने आस्था, अनास्था एवं अविश्वास के भंवर जाल में उलझाकर रख दिया तथा वर्तमान भौतिक युग में धन और स्वार्थ के वशीभूत होकर तकनीकी विकास को सर्वोपरि मानकर, आध्यात्मिक विकास को दरकिनार कर एवं धर्म पथ से विमुख होकर मन माना आचरण करने लगे हैं जिससे अवांछित, असाध्य व्याधियां एवं गंभीर सामाजिक समस्याएं उत्पन्न हो गई है तथा ऐसा प्रतीत होता है कि मानव उत्थान के सारे रास्ते गुम हो गए I

भारतीय धर्म विज्ञान का श्रेष्ठ तम स्वरूप है I विज्ञान के सारे साधनों में ज्येष्ठ स्वरूप भारतीय धर्म में पाश्चात्य काल गणना की तरह वैज्ञानिकता का कोई स्थान नहीं है I पाश्चात्य जगत जहां सूर्य को स्थिर मंत्र मानकर ग्रहों के परिक्रमण काल से संतुष्ट हो जाता है वही भारत में प्रत्येक ग्रह की आठ प्रकार की गतियां मानी गई है जोकि वक्र , अनु वक्र, कुटिल, मंद, मंद तर, सम, शीघ्र तर तथा शीघ्र मानी गयी है I इन गतियों में मंद, मंद तर, सम, शीघ्र तर तथा शीघ्र पांच मार्गी गतियां जबकि वक्र अनुवक्र एवं कुटिल यह तीनों वक्ररी गतियां है I

भारतीय काल गणना

समस्त इंद्रियों से अगोचर परम सूक्ष्म इकाई परमाणु है जो दो एक जगह होते हैं तो वह अणु बनता है I तीन अणु का युग्म त्रसेतरणु होता है जिसे पार करने में सूर्य किरण को लगने वाला समय त्रुटि कहलाता है I इसका सोगुना समय वेध व 3 वेध का एक लव होता है I तीन लव का एक निमेष व तीन निमेष का एक क्षण होता है I 18 दिन में निमेष की एक काष्ठा, 30 काष्ठा से एक मुहूर्त है I 30 मुहूर्त का अहोरात्र होता है I 15 अहो रात्र से शुक्ल तथा 15 अहोरात्र से कृष्ण पक्ष और दोनों को मिलाकर एक मास् होता है जो पितरों का अहोरात्र है I 2 माह की एक ऋतु व 6 मास का एक अयन होने तथा नाम भेद से उत्तरायण व दक्षिणायन दो अयनों के योग से एक संवत्सर होता है जो देवताओं का अहोरात्र है I सतयुग, त्रेता, द्वापर व कलयुग में क्रमश चार, तीन, दो व एक दिव्य वर्ष होते हैं तथा प्रत्येक युग के पूर्व में संध्या अर्थात पूर्व संधिकाल तथा अंत में संध्याश अर्थात अंतिम संध्याकाल होता है I ये दोनो संध्याश युग मान का 10 भाग होते है I देव के एक हज़ार युग का मान ब्रह्मा के एक दिन व एक हज़ार युग का मान ब्रह्मा की रात्रि का मान होता है जो ईसए जानते है वे अहोरात्र के ग्याता होते है I आइए 2000 वर्ष पूर्व वह 2000 वर्ष बाद की शुद्र नाड़ी से बाहर निकले और अनंत की यात्रा के अनुगामी बने I अब तक हम जान चुके हैं कि 360 दिन वाला एक संवत्सर देवताओं का एक दिन व रात होता है I अतः 360 दिव्य अहोरात्र अर्थात 360 मनुष्य वर्षों का कुल मान एक देव वर्ष है I कुल 4000 दिव्य वर्ष अर्थात 4,000* 360 = 1440000 मनुष्य वर्षों का मान का सतयुग काम है जिसमे संध्या व संध्याश का मान 400, 400 दिव्य वर्ष व 400* 360= 144 000 व 144 000 मनुष्य वर्ष हैं I परिणामित्र सत्य युग का कुल मान 4800 दिव्य वर्ष अथवा 144 0000+ 144 000+144 000 = 1728000 मनुष्य वर्ष होता है I त्रेता युग का मान 3000 दिव्य वर्ष अर्थात 3000*360=1080000 मनुष्य वर्ष है वहीं इसकी संध्या व संध्याश का मान भी 300*360=108000 एवं 300*360=108000 मनुष्य वर्ष है I परिणामित्र त्रेता युग का कुल मान 1080000+108000+108000=1296000 मनुष्य वर्ष है I इसी प्रकार द्वापर युग का मान 2000 दिव्य वर्ष+ 200 दिव्य संध्या वर्ष+200 दिव्य संध्याश वर्ष=2400 दिव्य वर्ष एवं 2000*360 + 200*360 + 200*360=8,64,000 मनुष्य वर्ष है I

कलयुग का मान 1000दिव्य वर्ष +100 दिव्य दिव्य संध्या वर्ष+100 दिव्य संध्याश वर्ष =1200दिव्य वर्ष तदनुसार 3,60,000+36,000+36,000=4,32,000मनुष्य वर्ष है I चतुर्युगी का कुल मान 4800+3600+2400+1200 दिव्य वर्ष=12000 दिव्य वर्ष अथवा 43,20,000 मनुष्य वर्ष है I देवों के 1000 युगों का महान ब्रह्मा के 1 दिन वह 1000 युगों का महान ब्रह्मा की एक रात्रि के तुल्य होता है अतः ब्रह्मा के 1 दिन का मान 1,20,00,000दिव्य वर्ष अथवा 4,32,00,00,000 मनुष्य वर्ष है अर्थात चार अरब बतीस करोड़ मनुष्य वर्ष के तुल्य ब्रह्मा का दिन व इसी के तुल्य किसी के तुल्य ब्रह्मा की रात्रि होती है वह 8 अरब 64 करोड़ मनुष्य वर्षों के तुल्य ब्रह्मा की रात्रि अहो रात्रि का महान है I यह काल ही मर्यादा पुरुषोत्तम श्री राम का दंड है जो उद्भव पालन व प्रलय की कहानी रचाता है I राम के इस दिव्य सवरूप को हरदय मे धारण करना है, सव्य को राम भक्त बनाना है ब्रह्मवेता बनाना है I अतः आइए अनंत के दिव्य स्वरूप को हृदय में धारण करें जाने की भूमध्य रेखा कहां है चैत्र का नाम चैत्र क्यों है तथा चैत्र की प्रतिपदा नव वर्ष का पहला दिन क्यों है I सर्वप्रथम मंगलाचरण कर यात्रा आरंभ करें I

भारतीय संस्कृति का मूल आधार वेद है I
भारतीय विद्या वेदों से प्रगट हुई है I वेदों के ६ अंग कहे गये है
१-शिक्षा, २-कल्प, ३-व्याकरण, ४-निरुक्त, ५- छंद तथा ६ज्योतिष I
ईन्हे षढ़-वेदांग की संज्ञा दी गई है Iमंत्रों के उच्चारण के लिए शिक्षा का, उचित कर्मकांड और यज्ञ अनुष्ठान के लिए कल्प का, शब्दों के रूप ज्ञान के लिए व्याकरण का, अर्थ ज्ञान के निमित्त शब्दों के निर्वचन के लिए निरुक्त का, वेदिक छंदों के ज्ञान हेतु छंद का और अनुष्ठानों के उचित काल निर्णय के लिए ज्योतिष का उपयोग मान्य है Iमहर्षि पाणिनि ने ज्योतिष को वेद पुरुष का नेत्र कहा है I जैसे मनुष्य बिना चक्षु इंद्रिय के किसी भी वस्तु का दर्शन करने में असमर्थ होता है ठीक वैसे ही वेदशास्त्र या वेद शास्त्र विहित कर्मों को जानने के लिए ज्योतिष का अत्यंतम महत्व सिद्ध है I भूतल, अंतरिक्ष एवं भूगर्भ के प्रत्येक पदार्थ का त्रकालिक यथार्थ ज्ञान जिस शास्त्र से हो वह ज्योतिषशास्त्र है Iअतः ज्योतिष ज्योतिका शास्त्र हैI ज्योतिष शास्त्र से त्रकालिक प्रभाव को जाना जा सकता है I वेद के अन्य अंगों की अपेक्षा अपनी विशेष योग्यता के कारण ही ज्योतिष शास्त्र वेद भगवान का प्रधान अंग निर्मल चक्षु माना गया है और इसका अन्य कारण यह भी है भविष्य जानने की इच्छा सभी युगों में सभी लोगों में मनुष्यों के मन में सर्वदा प्रबल रहती है उसकी परिणीति जिसकी यह ज्योतिष शास्त्र है I अन्य शास्त्र अप्रत्यक्ष हैं I इसलिए उनमें तो विवाद ही रहता है रहता है किंतु ज्योतिष शास्त्र प्रत्यक्षशास्त्र है और इसके साक्षी सूर्य तथा चंद्रमा है I

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